खरीफ ऋतु में गो आधारित जैविक कृषि हेतु तकनीकी सलाह

श्रीरामशन्ताय जैविकअनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र
संस्था – गोयल ग्रामीण विकास संस्थान कोटा
ग्राम जाखोड़ा, कैथून – सांगोद, मार्ग कोटा राजस्थान
पिनकोड-325001 मोबाइल .- 8875995439

खरीफ ऋतु में गो आधारित जैविक कृषि हेतु तकनीकी सलाह
गो आधारित जैविक कृषि से सभी फसलों में उत्पादन हेतु तकनीकी जानकारी निम्नलिखित हैं-
यदि पहली बार जैविक कृषि हेतु प्रयास कर रहे हैं और फसल मे बम्पर उत्पादन और भूमि की उर्वरता को बढ़ाना है तो खरीफ ऋतु मे हरी खाद हेतु सण (सनई) या ढैचे की फसल ले और फूल आने के बाद खड़ी फसल में ट्रेक्टर से जुताई कर दे। हरी खाद हेतु ढैंचा या सण (सनई) का बीज एक एकड़ मे 40 किलोग्राम उपयोग करे। हरी खाद की फसल की बुवाई गेहं/सरसों/चना अर्थात् रबी फसलों की कटाई के पश्चात् भी सिंचाई एवं सुरक्षा उपलब्ध होने पर की जा सकती है। हरी खाद हेतु ढैंचा की फसल लेने से मिट्टी की लवणीयता (उसर की समस्या) का समाधान आसानी से हो जाता है एवं खरपतवार नियन्त्रण भी हो जाता है।
बारिश या सिंचाई में दो बार 30 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर (48 घण्टें तक का) घोल बनाकर दे। घोल बनाने की व्यवस्था नहीं है तो छोटे-छोटे लड्डू बनाकर दे। ताकि गोबर का रस खेत में पहुँच जाये। (विदित है कि देशी गाय के गोबर में लाभदायक जीवाणुओ की प्रर्याप्त संख्या होती है। जो भूमि में उपलब्ध खनिज तत्वों को उपयोगी अवस्था में बदलने का कार्य करते है। जिससे फसल का उत्पादन बढ़ता है एवं भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।)
नोट: – ये ताजा गोबर एक तरह से जीवाणु कल्चर है, न कि खाद। इसलिए खाद के लिए बुवाई से दो-तीन दिन पूर्व प्रति एकड़ में 8 टन कम्पोस्ट खाद देना चाहिए। बुवाई के 1 माह बाद प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13 बिस्वा) में 2 क्विंटल खाद/कम्पोस्ट फैक देना चाहिए।
कम्पोस्ट खाद बनाने हेतु एक टन या एक ट्रोली की रेवड़ी/गोबर ढेर हेतु 150 ली. पानी, 2 किलोग्राम गुड़ (काला या खराब भी चलेगा) 30ली. ताजा छाछ, 30 किग्रा. ताजा गोबर (देशी गाय का) का घोल बनाएं। रेवड़ी में 2 इंच चैड़े छेद कर गहराई तक डाले। शेष घोल को उपर फैलाएं और उपर कचरे ये ठके। 2 माह बाद खाद तैयार हो जाएगा।
बुवाई के 20 दिन बाद जब सम्भव हो, गोमूत्र में पान तम्बाकु के साथ उपयोग होने वाली 2 चूना ट्यूब मिलाकर छिड़काव करे अर्थात् 1.5 लीटर गोमूत्र और 24 ग्राम तरल चूना/पान तम्बाकु के साथ उपयोग होने वाली 2 चूना ट्यूब को 13.5 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। यह 15 लीटर क्षमता वाली 1 टंकी का घोल है। इस अनुसार अपने अपने क्षेत्र के उपयोग होने वाली टंकी की क्षमता अनुसार घोल तैयार करें।

नोट: – फसल में हल्का पिलापन दिखनें पर उपरोक्त उपचार तुरन्त करें ये अत्यन्त प्रभावी उपचार है। समस्या नही होने पर बुवाई के 20 दिन बाद जब सम्भव हो 15-15 दिन के अन्तराल पर दो छिड़काव करने पर उत्पादन अच्छा मिलता है। लेकिन यह भी ध्यान दें कि खेत में यदि पिलापन जड़गलन से हुआ हो तो ट्राइकोड्रर्मा युक्त खाद का छिड़काव करें।
1. उपरोक्त घोल हेतुू चूना नहीं हो तो प्रति टंकी 250 ग्राम दुब घास का ज्यूस मिलाए। दुब घास नहीं हो तो 1 किलोग्राम सोयाबीन को 24 घन्टें पानी में भिगों कर, अच्छे से फूल जाने पर बारीक पीस ले। इसी में 250 ग्राम गुड़ मिला दे। 5 लीटर पानी मिलाकर 3 दिनों तक कपड़े से ढक कर रखे। तीन दिन बाद घोल को छानकर, आधा लीटर प्रति टंकी (15 ली.पानी) की दर से छिड़काव करें। (ये सोया घोल 7 दिन तक ही स्टोर होता है) यह सब भी फसल की बढ़वार एवं उत्पादन की वृद्धि हेतु कारगर उपाय है।
2. पंचगव्य उपलब्ध हो तो 1 टंकी (15 ली.) में 450 एम.एल. पंचगव्य मिला कर छिड़काव 45-65 दिन की फसल पर करे। पंचगव्य उपलब्ध नहीं हो तो अभी बना लीजिए। पंचगव्य भूमि एवं फसल दोनों के लिए अत्यन्त लाभकारी है।
3. पंचगव्य/गोमूत्र या सोयाबीन, चूना आदि नही हो तो 450 ग्राम सहजन ज्यूस 1 टंकी (15 ली.पानी) मिला कर छिड़काव करे। इससे फसल हरीभरी रहती है।
4. बुवाई के 70 दिन बाद या अनाज में दाने की दूधिया अवस्था में सप्तधान्यंकुर ज्यूस बनाकर छिड़काव करें। इसके लिए तिल (काले या सफेद कोई भी), मूंग, उड़द, लोबिया, मोठ/मूठी, मसूर, गैहूँ, चने प्रत्येक 100-100 ग्राम ले। सबसे पहले दिन एक कटौरी में तिल भिगो दे, दूसरे दिन शेष सभी अनाज अगले दिन अलग अलग कटोरीयों में भिगो दे। 24 घण्टें में अंकुरण के बाद सभी को एक कपड़े में खाली कर के पोटली बनाकर के टांग दे। हल्की की सी फुटान के बाद सभी अंकुरित अनाज की चटनी बना दे। इस के साथ 10 लीटर गौमूत्र (उपलब्ध हो तो) मिला लें और 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें। इससे प्राप्त उत्पादन की गुणवता में वृद्धि होती है।
अधिकतम फसलों में 20 दिन की अवस्था पर हानिकारक कीड़ों का घातक प्रभाव शुरू हो जाता है। इस के लिए 20 दिन की फसल पर कीट नियन्त्रण हेतु अभी से ही वनस्पत्ति रस बनाएं इसका विवरण निम्नलिखित है जो कि एक माह बाद उपयोग हेतु तैयार मिलेगा:-

वनस्पतियों से निर्मित घोल की विस्तृत जानकारी

निर्माण सामग्री –
200 लीटर पानी 10 किलोग्राम गाय का गोबर
10 लीटर गोमूत्र 2 किलोग्राम करंज के पत्ते
2 किलोग्राम सीताफल के पत्ते 2 किलोग्राम धतूरा के पत्ते
2 किलोग्राम तुलसी के पत्ते 2 किलोग्राम पपीता के पत्ते
2 किलोग्राम गेन्दा के पत्ते 5 किलोग्राम नीम के पत्ते
5 किलोग्राम बेल के पत्ते 2 किलोग्राम कनेर की पत्ती
500 ग्राम तम्बाकू पीस कर या काटकर 500 ग्राम लहसुन
500 ग्राम पिसी हल्दी 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च
200 ग्राम अदरक या सौंठ

बनाने की विधि –

सर्वप्रथम एक प्लास्टिक के ड्रम में 200 ली. पानी डाले फिर इसमें 10 किलोग्राम गाय का गोबर और 10 ली. गोमूत्र मिला दें। अब इसमें नीम, करंज, सीताफल, धतूरा, बेल, तुलसी, आम, पपीता, कंजरे, गेन्दा की पत्ती की चटनी डालें और डण्डें से चलाएं फिर दूसरे दिन तम्बाकू, मिर्च, लहसुन, सौंठ, हल्दी डाले फिर डण्डें से चलाकर जालीदार कपडे़ से बन्द कर दें और 10 दिन छाया में रखा रहने दें, परन्तु प्रतिदिन सुबह शाम डण्डें से हिलाते जरूर रहें।

भण्डारण एवं अन्य सावधानियाँ – इसको 6 माह तक प्रयोग कर सकते है। इस घोल को छाया में रखें। बनाते समय इसकों सुबह शाम हिलाना न भूले। प्रति एकड़ के लिए 200 लीटर पानी में 10 लीटर उपरोक्त घोल मिलाकर छिड़काव करें।
इस के अलावा अभी से ही नीम निम्बोंली, करंज बीज, राख, गौमूत्र आदि इक्कठा जो आगे जा कर उपयोगी साबित होगी।

उपरोक्त के अतिरिक्त किसान भाई निम्नलिखित बिन्दुओं पर भी अवश्य चिंतन एवं अध्ययन करें –
तकनीकी जानकारी, खेत का चयन व बफर जोन की रचना, आवश्यक सुविधाएं, मिश्रित खेती, मिट्टी एवं पानी की जाँच, परत खेती, प्रमाणीकरण एवं समूह रचना, फसल अवशेष प्रबन्धन, खेत की सफाई, दीमक नियन्त्रण, जुताई की विधि, मुख्य फसल का चुनाव, दलहनी फसल, पशुओं के लिए हरा चारा, विविधता का सन्तुलन, फसल चक्र, पोषण प्रबन्धन, भूमि उपचार से कीट व रोग नियन्त्रण, मृदा सुधारक, मृदा सुधारक, स्वदेशी परम्परागत व उन्नत बीज, टेªप क्राॅप/फसल टेªप क्राॅप/फसल, बगीचा स्थापना, स्वस्थ नर्सरी, फसल सघनता, बीज की गहराई, बुवाई का समय, जल निकास व सदुपयोग, आच्छादन/मल्च, पर्यावरण मित्र तकनीकी व टेªप, खरपतवार प्रबन्धन, बगीचे का प्रबन्धन, कीट व रोग नियन्त्रण, बाजार व्यवस्था, मूल्य संवर्धन
भण्डारण, दैनिक डायरी का उपयोग, नवीन कृषकों से कनेक्टीविटी, कृषि यन्त्रों का रखरखाव व सफाई।

नोट:- तकनीकी प्रशिक्षण के लिए श्रीरामशन्ताय जैविक कृषि अनुसंधान व प्रशिक्षण केन्द्र कोटा द्वारा हर माह की 15 तारीख को प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होता है उसमें आप पंजीकरण करा सकते है – पंजीकरण के लिए नं. 8875995439

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