धान की जैविक खेती
धान मुख्यतः कोटा संभाग, गंगानगर, हनुमानगढ़, उदयपुर, बाँसवाड़ा एवं डूँगरपुर जिले में बोई जाने वाली प्रमुख फसल है, धान की जैविक खेती की कृषि विधियाँ इस प्रकार हैः-
रोपाई हेतु उन्नत किस्में – पूसा बासमती 1509 (2013), प्रताप सुगन्धा – 1 (2013), इम्प्रुव पूसा बासमती – (2007), पूसा सुगन्धा – 4 (पुसा-1121) (2005), पूसा सुगन्धा – 5 (2004), पी.आर.एच – 10 (2002), माही सुगंधा (1995),
सीधी बुवाई हेतु उन्नत किस्मे अशोका – 200 एफ (2003), वागड़ धान (1999) – बीज उपलब्धता का स्त्रोत कृषि अनुसंधान केन्द्र एवं कृषि विज्ञान केन्द्र।
सीधी बुवाई द्वारा धान की खेती: – ऊँची भूमि में धान की खेती के लिए खेत में पानी भरा रखने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। अतः फसल अधिकांशतः वर्षा के जल पर ही निर्भर करती है। पर्याप्त वर्षा हो जाने पर पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद में दो-तीन बार देशी हल त्रिफाली या बक्खर से जुताई करके खेत अच्छी तरह तैयार करें। बुवाई से 1 सप्ताह पहले या खेत की अंतिम जुताई के समय सरल कम्पोस्ट खाद 8 से 10 टन प्रति हैक्टेयर की दर से देवे । बीज दर एवं बुवाई – प्रति हैक्टेयर 60 से 75 किलो धान का बीज बोये। वर्षा आरम्भ होते ही हल के पीछे में लाईनों में ड्रिल या पोरे से 25 से.मी. की दूरी पर बुवाई करें। बीज को 3 से 5 से.मी. से ज्यादा गहरा न बोएं।
बीजोपचार
थोथे बीजों को निकालने के लिए बीजों को 2 प्रतिशत नमक के घोल में डालकर अच्छी तरह से हिलाये। ऊपर तैरते हल्के बीजों को छांटकर अलग करें और पैदे में बैठे बीजो को साफ पानी में धोकर सुखा ले, अच्छे अंकुरण और कीट रोग प्रतिशेध कर्ता के लिए 100 ग्राम देशी गाय के ताजा गोबर को प्रति किलोग्राम बीज में मिलाकर बोनें से पहले उपचारित किया जाता है। इसके अलावा धान के प्रमुख रोगों की रोकथाम के लिए ट्राईकोडर्मा (मित्र फफूंद) 10 ग्राम दवा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें। तत्पश्चात् बुवाई के काम में लेवे।
रोपणी द्वारा धान की खेती
विधि : मध्यम अवधि की किस्मों के लिए रोपणी जून के दूसरे सप्ताह तक लगायें। शीघ्र पकने वाली किस्मों की रोपणी जून के अंतिम सप्ताह तक भी लगाई जा सकती है। रोपणी के लिए समतल खेत का चुनाव करें ताकि जहाँ पानी उपलब्ध हो वहाँ गीली रोपणी तैयार करने हेतु खेत में पानी भरकर अच्छा गारा तैयार करें। प्रत्येक 100 वर्गमीटर नर्सरी के लिए प्रत्येक 100 वर्गमीटर नर्सरी के लिए एक क्विंटल सरल कम्पोस्ट खाद की आवश्यकता होती है। रोपणी हेतु एक से डेढ मीटर चैड़ी क्यारियां बनायें। एक हैक्टेयर खेत के लिए आवश्यक पौध हैक्टेयर के 10 वें भाग में 25-30 किलो बीज से प्राप्त की जा सकती है। तैयार की हुई क्यारियों में ताजा गोबर उपचारित (100 ग्राम देशी गाय का ताजा गोबर प्रति किलोग्राम बीज से) उपचारित सूखा बीज 50 से 60 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से छिड़क देवें। नर्सरी में पौधे पीले पड़ने लगे तो गोमूत्र में दस गुणा पानी और चूना (खाने के जर्दा वाली चूना ट्यूब) मिलाकर छिड़काव करे अर्थात् 1.5 लीटर गोमूत्र और 12 ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 2 चूना ट्यूब) को 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। एक बीघा कि नर्सरी (1620 वर्गमीटर/13 बिस्वा) में 4 टंकी (60 लीटर पानी ) में 6 लीटर गोमूत्र और ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 6 चूना ट्यूब) मिलाकर छिड़काव करें।
रोपाई के लिये खेत की तैयारी
धान की खेती के लिए समतल खेत का चुनाव करें तथा उसमें जल निकासी को ध्यान में रखे। रोपाई से 1 सप्ताह पहले या खेत की अंतिम जुताई के समय 8 से 10 टन सरल कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर की दर से देवे । धान की पौध की रोपाई के लिए तैयार किये गये खेत को दो सप्ताह तक पानी से भरकर रखें। साथ ही एजोला बीज 1 किलोग्राम बीज प्रति बीघा की दर से खेत में भरे हुए पानी में फैला दे तथा दो सप्ताह बाद खेत से पानी निकालकर खेत की जुताई करे। खेत में धान की रोपाई के बाद भी एजोला का प्रयोग करें ।इस एजोला के प्रयोग से खेत में 50 किलो प्रति हैक्टेयर नत्रजन का स्थिरीकरण हो जाता है। इससे धान में लीफ रोलर कीट का नियंत्रण होता है एवं धान के खेत में एजोला खरपतवार को बढ़ने से रोकता है।
रोपाई
धान की जिस किस्म की फसल जितने माह खेत में खड़ी रहती है, उसकी उतने ही सप्ताह की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। साधारणतया 25 से 30 दिन की स्वस्थ पौध रोपाई के काम में लेवें । पौध रोपाई से पूर्व धान की एक बीघा (1620 वर्गमीटर) के लिए उपयोग होने वाले पौध की जड़ों को उपचारित करने हेतु 30 किलोग्राम देशी गाय के ताजा गोबर में 100 लीटर पानी मिलाकर घोल बनायें और इन पौधों को इस घोल में 10 मिनट तक डुबोकर रखें। फिर पौधों को मुख्य खेत में रोपित करें। पौधों को 20-20 से.मी. की दूरी पर बनी कतारों में 15-15 से. मी. की दूरी पर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक रोपें । हर एक जगह 2 से 3 पौध लगावें । रोपाई 3 से.मी. से ज्यादा गहरी न हो अन्यथा फुटान कम होने से पैदावार कम होती है। रोपाई के समय खेत में अच्छा गारा होना चाहिए, इससे खरपतवार कम पनपेंगे किन्तु अधिक पानी को निकाल देवें जब खेत में जम जाये तब से उसमें पानी की सतह 5 सेमी.पर बनाये रखे।
प्रत्येक बार खेत में सिंचाई के समय 30 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर (48 घण्टें तक का) घोल बनाकर एक बीघा (1620 वर्गमीटर) के लिए दे। घोल बनाने की व्यवस्था नहीं है तो छोटे-छोटे लड्डू बनाकर दे। ताकि गोबर का रस खेत में पहुँच जाये। (विदित है कि देशी गाय के गोबर में लाभदायक जीवाणुओ की पर्याप्त संख्या होती है। जो भूमि में उपलब्ध खनिज तŸवों को उपयोगी अवस्था में बदलने का कार्य करते है)
नोट : – ये ताजा गोबर एक तरह से जीवाणु कल्चर है, न कि खाद। इसलिए खाद के लिए बुवाई से पूर्व प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13 बिस्वा) में 3 टन सरल कम्पोस्ट खाद देना चाहिए। बुवाई के 1 माह बाद प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13 बिस्वा) में 2 क्ंिवटल सरल कम्पोस्ट खाद फैक देना चाहिए।
सरल कम्पोस्ट खाद बनाने हेतु एक टन या एक ट्रोली की रेवड़ी/गोबर ढेर हेतु 200 ली. पानी, 2 किलोग्राम गुड़ (काला या खराब भी चलेगा) 30ली. छाछ, 30 किग्रा. ताजा गोबर (देशी गाय का) का घोल बनाएं। रेवड़ी में 2 इंच चैड़े छेद कर गहराई तक डाले। शेष घोल को उपर फैलाएं और उपर कचरे से ठके। 2 माह बाद सरल कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगा।
खाद के विषय में लिंक – https://youtu.be/ExhRh74SpDI
खरपतवार नियंत्रण
सीधी बुवाई वाले खेतों में खरपतवारों का प्रकोप अधिक होने के कारण उपज कम हो जाती है। घास कुल के खरपतवारों की रोकथाम हेतु रोपाई के 20-25 दिन में खरपतवार निकाल दे तथा समय-समय पर खरपतवार निकालते रहे।
खेतों में बुवाई के 10, 20, 30 एवं 40 दिन बाद धान के खेत में कोनोविडर यंत्र या कुल्फा चलाकर खरपतवार का नियंत्रण करें।
सिंचाई
अच्छे जल प्रबंध से फसल की फुटान अच्छी होगी। पौधों द्वारा नत्रजन अधिक ली जाएगी। खरपतवार कम होंगे और पानी की कुल मात्रा भी कम लगेगी। इन सबके लिए खेत समतल होना जरूरी है। खेत में 5-7 से.मी. पानी भरा रखे, फसल पकने के दो सप्ताह पहले खेत से पानी निकाल देगें। जमीन भारी हो तो थोड़ा और पहले निकाल देवें।
पोषक तव प्रबन्धन (पर्णीय छिड़काव)
दूसरी बारिश के बाद जब सम्भव हो गोमूत्र में दस गुणा पानी और चूना (खाने के जर्दा वाली चूना ट्यूब) मिलाकर छिड़काव करे अर्थात् 10 लीटर गोमूत्र और 60 ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 10 चूना ट्यूब) को 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। एक बीघा (1625 वर्गमीटर/13 बिस्वा) में 4 टंकी (60 लीटर पानी ) में 6 लीटर गोमूत्र और 50 ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 6 चूना ट्यूब) मिलाकर छिड़काव करें।
नोट : – फसल में हल्का पीलापन दिखनें पर उपरोक्त उपचार तुरन्त करें ये अत्यन्त प्रभावी उपचार है। लेकिन यह भी ध्यान दें कि खेत में यदि पीलापन जड़गलन से हुआ हो तो ट्राइकोड्रर्मा युक्त खाद का छिड़काव करें।
चूना नहीं हो तो प्रति टंकी (15 लीटर) 250 ग्राम दुब घास का ज्यूस मिलाए। दुब घास नहीं हो तो 1 किलोग्राम सोयाबीन को 24 घन्टें पानी में भिगों कर, अच्छे से फूल जाने पर बारीक पीस ले। इसी में 250 ग्राम गुड़ मिला दे। 5 लीटर पानी मिलाकर 3 दिनों तक कपड़े से ढक कर रखे। तीन दिन बाद घोल को छानकर, आधा लीटर प्रति टंकी (15 ली.पानी) की दर से छिड़काव करें। (ये सोया घोल 7 दिन तक ही स्टोर होता है) पंचगव्य उपलब्ध हो तो 1 टंकी (15 ली.) में 450 एम.एल. पंचगव्य मिला कर छिड़काव 45-65 दिन की फसल पर करे। पंचगव्य उपलब्ध नहीं हो तो अभी बना लीजिए।पंचगव्य/गोमूत्र या सोयाबीन, चूना आदि नही हो तो 450 ग्राम सहजन ज्यूस 1 टंकी (15 ली.पानी) मिला कर छिड़काव करे। बुवाई के 70 दिन बाद या धान की बालियों में दाने की दूधिया अवस्था में सप्तधान्यंकुर ज्यूस बनाकर छिड़काव करें। इसके लिए तिल (काले या सफेद कोई भी), मूंग, उड़द, लोबिया, मोठ/मूठी, मसूर, गैहूँ, चने प्रत्येक 100-100 ग्राम ले। सबसे पहले दिन एक कटौरी में तिल भिगो दे, दूसरे दिन शेष सभी अनाज अगले दिन अलग अलग कटोरीयों में भिगो दे। 24 घण्टें में अंकुरण के बाद सभी को एक कपड़े में खाली कर के पोटली बनाकर के टांग दे। हल्की की सी फुटान के बाद सभी अंकुरित अनाज की चटनी बना दे। इस के साथ 10 लीटर गौमूत्र (उपलब्ध हो तो) मिला लें और 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।
फसल संरक्षण
धान फसल पर कीट एवं रोगों का प्रकोप होने की दशा में निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए।
खेत की सफाई करना : फसलों की कटाई हो जाने के बाद प्रायः उनके अवशेषों को खेत में छोड़ दिया जाता है। ये अवशेष अपने में पल रहे विभिन्न कीटों के जनन शरण तथा कीटों की शीत निद्रा व्यतीत करने के स्थानों के रूप में काम में आते है। इसलिए इनको खेतों से हटाया जाना आवश्यक है।
ग्रीष्मकालीन जुताई करें : खेत की गहरी जुताई करने से कीटों की भूमि में उपस्थित विभिन्न अवस्थाएं (अण्डे, सूडी व शंकु आदि) बाह्य वातावरण में आ जाती है। वहा उन्हें प्राकृतिक शत्रु खा जाते है या प्रतिकुल मौसम के कारण मर जाते है।
फसल चक्र अपनावें ।
अगेती बुवाई करे। कम समय में पकने वाली किस्मों की बुवाई करे
रोपाई करने से पूर्व आधी पत्तियां तोड़ दें।
सघन रोपाई/बुवाई न करें तथा फसल में छाया न हों।
लीप हाॅपर का प्रकोप हो तो खेतों से पानी निकाल दें।
खेत की मेडों आदि पर खरपतवार नहीं पनपने दें।
फेरोमोन ट्रेप एवं प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें।
फसल के मित्र जीव/कीट जैसे मिरिंड बग, मकडियां बीटल, ततैया आदि का संरक्षण कर बढ़ावा देना चाहिए। तना छेदक एवं फुदका कीट के नियंत्रण के लिये 50000 अण्डे (25 ट्राईकोकार्ड) प्रति हैक्टेयर, बुवाई के 30 दिन बाद या रोपाई के बाद 6 बार एक सप्ताह के अन्तराल से प्रयोग करें।
खेत की मेडों पर फूल वाले पौधे लगाने चाहिए जिससे परजीवी कीटों को पराग मिल जाता है तथा उनके संरक्षण में मदद मिलती है। जैसे गेन्दा, गेलार्डिया, गुलदाऊदी।
कृषि एवं पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से महŸवपूर्ण वानस्पतिक कीटनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। अधिकतर पादप आधारित कीटनाशकों को किसान स्वयं ही तैयार कर सकते है। नीम, लहसुन, गेन्दा, तुलसी आदि के विभिन्न भागों से बने उत्पाद प्रयोग में लाए जाते है। इनमें नीम आधारित कीटनाशी जैसे निम्बौली का सत, नीम का तेल सर्वाधिक प्रचलित है।
दस वनस्पतियों से निर्मित घोल की विस्तृत जानकारी (वनस्पति रस)
निर्माण सामग्री –
200 लीटर पानी 2 किलोग्राम गाय का गोबर
10 लीटर गोमूत्र 2 किलोग्राम करंज के पत्ते
2 किलोग्राम सीताफल के पत्ते 2 किलोग्राम धतूरा के पत्ते
2 किलोग्राम तुलसी के पत्ते 2 किलोग्राम पपीता के पत्ते
2 किलोग्राम गेन्दा के पत्ते 5 किलोग्राम नीम के पत्ते
5 किलोग्राम बेल के पत्ते 2 किलोग्राम कनेर की पत्ती
500 ग्राम तम्बाकू पीस कर या काटकर 500 ग्राम लहसुन चटनी
500 ग्राम पिसी हल्दी 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च
200 ग्राम अदरक या सौंठ
बनाने की विधि –
सर्वप्रथम एक प्लास्टिक के ड्रम में 200 ली. पानी डाले फिर इसमें 2 किलोग्राम गाय का गोबर और 10 ली. गोमूत्र मिला दें। अब इसमें नीम, करंज, सीताफल, धतूरा, बेल, तुलसी, आम, पपीता, करंज, गेन्दा की पत्ती की चटनी डालें और डण्डें से चलाएं फिर दूसरे दिन तम्बाकू, मिर्च, लहसुन, सौंठ, हल्दी डाले फिर डण्डें से चलाकर जालीकर कपडे़ से बन्द कर दें और 30 दिन छाया में रखा रहने दें, परन्तु प्रतिदिन सुबह शाम डण्डें से हिलाते जरूर रहें। यह घोल 1 माह में तैयार होगा। प्रति टंकी (15 ली. पानी) में 1.5 ली. घोल प्रभावी रहेगा। यह तीन – चार भण्डारित किया जा सकता है। इस के अलावा अभी से ही नीम निम्बोंली, करंज बीज, राख, गौमूत्र आदि इक्कठा करें। जो आगे जा कर उपयोगी साबित होगी।
फसल कटाई : कटाई के 20 दिन पूर्व खेत से पानी बाहर निकाल दें एवं उपयुक्त समय पर कटाई करें भण्डारण से पूर्व बीजों में नमी की मात्रा 10-15 प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहियें।
धान में सितम्बर – अक्टूबर माह में लगने वाले प्रमुख कीट एवं उनके नियन्त्रण
क्र.स.
1 कीट का नाम – भूरा तेला (Brown Plant Hopper),
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – नीम तेल+करंज तेल+रतनजोत तेल+गौमूत्र
मात्रा- 2ml+2ml+2ml+100ml/लीटर
2 कीट का नाम – पिस्सू भंृग (Flea Beetle)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – दशपर्णी अर्क+नीम निम्बोंली अर्क
मात्रा- 100ml + 100ml/लीटर
3 कीट का नाम – पŸाी मोड़क (Leaf Roller)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – गौमूत्र+ छाछ
मात्रा- 100ml + 100ml/लीटर
4 कीट का नाम – सफेद मक्खी (White Fly)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – नीम तेल+ग्वारपाठा ज्यूस
मात्रा- 4ml + 20ml/लीटर
विशेष – उपरोक्त प्रत्येक कीट नियन्त्रक समग्र रूप से प्रभावी है अर्थात तेल सभी कीड़ों को नियन्त्रित करता है, तो अन्य में से प्रत्येक भी सभी कीड़ों को नियन्त्रित करता है।
धान में अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर माह में लगने वाले प्रमुख रोग एवं उनके नियन्त्रण
1- रोग का नाम – जड़ सड़न (Rotting)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – ट्राइकोड्रर्मा+कम्पोस्ट खाद
मात्रा – 1 kg + 100 kg/बीद्या
2- रोग का नाम – आभासी कंड रोग (Fals Smut), ब्लास्ट रोग (Blast)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – ट्राइकोड्रर्मा+स्यूडोमोनास+हल्दी
मात्रा – 5gm + 5gm + 4gm/लीटर
3- रोग का नाम – पŸाी अंगमारी (Leaf Blight), भूरी चिŸाी (Brown Spot), पŸाी अंगमारी (Leaf Blight), पैनिकल ब्लाइट (Panical Blight), भूरी पट्टी झुलसा (Brown Strip Blight)
नियन्त्रण हेतु उपयोगी उत्पाद – का नियन्त्रण दशपर्णी अर्क के द्वारा 100ml/लीटर की दर से करें।
मात्रा – 100ml/लीटर
नोट :- तकनीकी प्रशिक्षण के लिए हर माह की 15 तारीख को प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होता है उसमें आप पंजीकरण करा सकते है – पंजीकरण के लिए नं. 8875995439
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे –
श्रीरामशान्ताय जैविक कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र
ग्राम जाखौड़ा, कैथुन सांगोद सड़क मार्ग कोटा (राज)325001
(इकाई – गोयल ग्रामीण विकास संस्थान कोटा )
क़ेंद्र के नम्बर- 8875995439
E mail – ggvs@goyalglobal.com
केंद्र का परिचय नीचे लिंक में दिया गया है – https://youtu.be/sBxU2KKLySk
वेबसाइट – www.ggvsglobal.com
