गैहूँ की गौ आधारित –  जैविक खेती की तकनीकी जानकारी 

गैहूँ की गौ आधारित –  जैविक खेती की तकनीकी जानकारी
गेहूँ की अधिकतम पैदावार के लिये बलुई दोमट, उर्वरा व जलधारण क्षमतायुक्त मिट्टी वाले सिंचित क्षैत्र उपयुक्त है। इसकी खेती अधिकाशंतः सिंचित क्षैत्रों में की जाती है लेकिन भारी चिकनी मिट्टी व पर्याप्त जलधारण क्षमता वाली भूमि में असिंचित परिस्थितियों में भी उगाया जा सकता है। गेहूँ की अधिक उपज लेने के लिए उन्नत जैविक कृषि विधियाँ इस प्रकार है।
गेहूँ मुख्यतः कोटा संभाग, गंगानगर, हनुमानगढ़, उदयपुर, बाँसवाड़ा एवं डूँगरपुर जिले में बोई जाने वाली प्रमुख फसल है, गेहूँ की जैविक खेती की कृषि विधियाँ इस प्रकार हैः-
सीधी बुवाई हेतु उन्नत किस्में – एम.पी. – 3288 (2011), राज – 4120 (2008), एच.आई. – 8713 (2012), एच.आई – 8663 (पोषण) (2007), राज – 4079 (2010), राज – 4238 (2013), राज – 3777 (2005), राज – 4037 (2004), एच.डी. – 2864 ऊर्जा (2004), एच.आई – 8498 (1999), राज – 3765 (1996),
बीज दर एवं बुवाई
बुवाई के लिए सिफारिश अनुसार 100-125 किग्रा बीज पर्याप्त रहता है। गेहूँ की बुवाई लाइनों में कतार से कतार की दूरी 22.5 सेमी. में करें तथा बीज को 5 से.मी. से अधिक गहरा न बोयें। गेहूँ की बुवाई हेतु नवम्बर के प्रथम सप्ताह से तीसरे सप्ताह तक का समय उपयुक्त है। देरी से बुवाई करने पर पैदावार में कमी होती है। वातावरण में तापमान के आधार पर भी बुवाई का समय तय किया जा सकता है जिसमें न्यूनतम व अधिकतम तापमान का औसत जब 20 डिग्री सेल्सियस हो तब बुवाई करें।
बीजोपचार – गौमूत्र 1.5 लीटर $ चूना 2 ट्यूब (12 ग्राम) मिलाकर घोल बनायें (यह घोल एक दो घंटे में उपयोग कर लेना चाहिए)। तुरन्त इसी घोल से एक चाय वाला चम्मच (10 मिली) के हिसाब से प्रति किलो बीज पर छिड़काव करें और पूरे बीजों का ठिक से मिक्स करके उपचारित करें। तत्पश्चात् बीजों को छायादार जगह पर सूखा दें।
खेत की तैयारी
फसल की अच्छी वृद्धि के लिये खेत को भली-भांति तैयार करना चाहिये। प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा द्वितीय व तृतीय जुताई कल्टीवेटर से करके तुरंत पाटा लगाकर खेत को तैयार कर लें।

बुवाई से पूर्व सिंचाई/पलेवा/रिलाई –
गेहूँ की खेती के लिए समतल खेत का चुनाव करें तथा उसमें जल निकासी को ध्यान में रखे। गेहूँ की बुवाई के लिए तैयार किये गये खेत में एक बार सिंचाई करें। एक सप्ताह बाद बुवाई करें इससें खरपतवार नियन्त्रण भी हो जाता है। हालांकि कुछ जगह किसान बुवाई की बाद भी सिंचाई करते है अर्थात् बुवाई से पूर्व सिंचाई/पलेवा/रिलाई नहीं करते है
भूमि उपचार
दीमक और रूट एफीट की समस्या हो तो बचाव के लिए बुवाई से 15 दिन पहले एक क्ंिवटल कम्पोस्ट में 1 किलो मेटाराईजियम या वर्टीसिलियम मिलाकर छायादार जगह पर रखें। ये मिश्रण अन्तिम जुताई के समय प्रति बीघा/1620 वर्गमीटर की दर से खेत में फेक देवें या नीम की खली 20 किलोग्राम प्रति बीघा की दर से भूमि उपचार करें।
बुवाई से पूर्व सिंचाई/पलेवा/रिलाई के समय भूमि उपचार हेतू 30 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर (48 घण्टें तक का) घोल बनाकर एक बीघा (1620 वर्गमीटर) के लिए दे। घोल बनाने की व्यवस्था नहीं है तो छोटे-छोटे लड्डू बनाकर दे। ताकि गोबर का रस खेत में पहुँच जाये। (विदित है कि देशी गाय के गोबर में लाभदायक जीवाणुओ की पर्याप्त संख्या होती है। जो भूमि में उपलब्ध खनिज तत्वों को उपयोगी अवस्था में बदलने का कार्य करते है)
नोट: – ये ताजा गोबर एक तरह से जीवाणु कल्चर है, न कि खाद।
इसलिए खाद के लिए बुवाई पूर्व सिंचाई से 1 सप्ताह पहले या खेत की अंतिम जुताई के समय प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13-15 बिस्वा) में जहाँ गर्मियों में ढेंचे की हरी खाद की फसल थी, उस खेत में 3 टन सरल कम्पोस्ट या एक हैक्टेयर में 18 टन सरल कम्पोस्ट खाद देना चाहिए या जिस खेत में हरी खाद की फसल नहीं थी उसमें भी यही मात्रा( प्रति बीघा 1620 वर्ग मीटर/13-15 बिस्वा में 3 टन सरल कम्पोस्ट या एक हैक्टेयर में 18 टन सरल कम्पोस्ट खाद) उपयोग लेना चाहिए हांलाकि इससे उत्पादन में अन्तर रहेगा। तथा अन्तिम जुताई से पूर्व प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13-15 बिस्वा) में 50 किलो जिप्सम या एक हैक्टेयर में 250 किलो जिप्सम मिलायें।
यदि 25 प्रतिशत राॅक फास्फेट युक्त खाद उपलब्ध है तो प्रति बीघा 1620 वर्ग मीटर/13-15 बिस्वा में 1 टन सरल कम्पोस्ट या एक हैक्टेयर में 5 टन सरल कम्पोस्ट खाद उपयोग लेना चाहिए

सरल कम्पोस्ट खाद बनाने हेतु एक टन या एक ट्रोली की रेवड़ी/गोबर ढेर हेतु 200 ली. पानी, 2 किलोग्राम गुड़ (काला या खराब भी चलेगा) 30ली. छाछ, 30 किग्रा. ताजा गोबर (देशी गाय का) का घोल बनाएं। रेवड़ी में 2 इंच चैड़े छेद कर गहराई तक डाले। शेष घोल को उपर फैलाएं और उपर कचरे से ठके। 2 माह बाद सरल कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगा। इसी ढेर में उपरोक्त घोल डालने से पहले कुल अपशिष्ट का 25 प्रतिशत राॅक फास्फेट मिलाकर प्रोम  (Phosphate Rich organic manure) कम्पोस्ट भी बनाया जा सकता है।
खरपतवार नियंत्रण
सीधी बुवाई वाले खेतों में खरपतवारों का प्रकोप अधिक होने के कारण उपज कम हो जाती है। इसलिए बुवाई से पूर्व सिंचाई अर्थात् पलेवा/रिलाई जरूर करें। घास कुल के खरपतवारों की रोकथाम हेतु बुवाई के 20-25 दिन में खरपतवार निकाल दे तथा समय-समय पर खरपतवार निकालते रहे। खेतों में बुवाई के 10, 20, 30 एवं 40 दिन बाद गेहूँ के खेत में कोनोविडर यंत्र या कुल्फा चलाकर खरपतवार का नियंत्रण करें।
सिंचाई
गेहूँ की फसल के लिए भूमि में नमी की उपलब्धता को देखने हुए भारी मिट्टी में 3-4 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। प्रथम सिंचाई बुवाई फसल बोने के 20-25 दिन पर शीर्ष जड़ जमने के समय करें। दूसरी सिंचाई फसल फुटान की उत्तरावस्था पर 50-60 दिन पर करें। तीसरी सिंचाई बुवाई के 75-80 दिन बाद बालियाँ शुरू होने की अवस्था पर करें तथा चोथी सिंचाई दानें की दूधिया अवस्था पर 95-100 दिन पर करें।
बुवाई के 1 माह बाद खाद द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन
प्रति बीघा (1620 वर्ग मीटर/13 बिस्वा) में 2 क्ंिवटल या एक हैक्टेयर में 1.5 टन सरल कम्पोस्ट खाद फैक देना चाहिए।

पोषक तत्व  प्रबन्धन (पर्णीय छिड़काव)
नोट: – सर्दियों में तापमान के कम होने के कारण पोषक तत्व की कमी से बढ़वार नहीं होती उसके लिए उपाय गौमूत्र 1.5 लीटर+ चूना 2 ट्यूब/टंकी (15 लीटर) का स्प्रे करें व पाले की समस्या होने पर भी यह स्प्रे कर सकते है अर्थात् 10 लीटर गोमूत्र और 60 ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 10 चूना ट्यूब) को 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। एक बीघा (1620 वर्गमीटर/13 बिस्वा) में 4 टंकी (60 लीटर पानी) में 6 लीटर गोमूत्र और 50 ग्राम चूना (खाने के जर्दा वाली 6 चूना ट्यूब) मिलाकर छिड़काव करें।

नोट: – फसल में हल्का पीलापन दिखनें पर उपरोक्त उपचार तुरन्त करें ये अत्यन्त प्रभावी उपचार है। लेकिन यह भी ध्यान दें कि खेत में जल भराव ज्यादा होने पर यदि पीलापन जड़गलन से हुआ हो तो ट्राइकोड्रर्मा युक्त खाद का छिड़काव करें।
चूना नहीं हो तो प्रति टंकी (15 लीटर) 250 ग्राम दुब घास का ज्यूस मिलाए। दुब घास नहीं हो तो 1 किलोग्राम सोयाबीन को 24 घन्टें पानी में भिगों कर, अच्छे से फूल जाने पर बारीक पीस ले। इसी में 250 ग्राम गुड़ मिला दे। 5 लीटर पानी मिलाकर 3 दिनों तक कपड़े से ढक कर रखे। तीन दिन बाद घोल को छानकर, आधा लीटर प्रति टंकी (15 ली.पानी) की दर से छिड़काव करें। (ये सोया घोल 7 दिन तक ही स्टोर होता है)
पंचगव्य उपलब्ध हो तो 1 टंकी (15 ली.) में 450 एम.एल. पंचगव्य मिला कर छिड़काव 45-65 दिन की फसल पर करे। पंचगव्य उपलब्ध नहीं हो तो अभी बना लीजिए। पंचगव्य/गोमूत्र या सोयाबीन, चूना आदि नही हो तो 450 ग्राम सहजन ज्यूस 1 टंकी (15 ली.पानी) मिला कर छिड़काव करे।
बुवाई के 70 दिन बाद या गेहूँ की बालियों में दाने की दूधिया अवस्था में सप्तधान्यंकुर ज्यूस बनाकर छिड़काव करें। इसके लिए तिल (काले या सफेद कोई भी), मूंग, उड़द, लोबिया, मोठ/मूठी, मसूर, गेहूँ, चने प्रत्येक 100-100 ग्राम ले। सबसे पहले दिन एक कटौरी में तिल भिगो दे, दूसरे दिन शेष सभी अनाज अगले दिन अलग अलग कटोरीयों में भिगो दे। 24 घण्टें में अंकुरण के बाद सभी को एक कपड़े में खाली कर के पोटली बनाकर के टांग दे। हल्की की सी फुटान के बाद सभी अंकुरित अनाज की चटनी बना दे। इस के साथ 10 लीटर गौमूत्र (उपलब्ध हो तो) मिला लें और 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।

गेहूँ फसल पर कीट एवं रोगों का प्रकोप होने की दशा में निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए।
खेत की सफाई करना: फसलों की कटाई हो जाने के बाद प्रायः उनके अवशेषों को खेत में छोड़ दिया जाता है। ये अवशेष अपने में पल रहे विभिन्न कीटों के जनन शरण तथा कीटों की शीत निद्रा व्यतीत करने के स्थानों के रूप में काम में आते है। इसलिए इनको खेतों से हटाया जाना आवश्यक है।
ग्रीष्मकालीन जुताई करें: खेत की गहरी जुताई करने से कीटों की भूमि में उपस्थित विभिन्न अवस्थाएं (अण्डे, सूडी व शंकु आदि) बाह्य वातावरण में आ जाती है। वहा उन्हें प्राकृतिक शत्रु खा जाते है या प्रतिकुल मौसम के कारण मर जाते है।
फसल चक्र अपनावें ।
अगेती बुवाई करे। कम समय में पकने वाली किस्मों की बुवाई करे
सघन रोपाई/बुवाई न करें तथा फसल में छाया न हों।
खेत की मेडों आदि पर खरपतवार नहीं पनपने दें।
फसल के मित्र जीव/कीट जैसे मिरिंड बग, मकडियां बीटल, ततैया आदि का संरक्षण कर बढ़ावा देना चाहिए।
खेत की मेडों पर फूल वाले पौधे लगाने चाहिए जिससे परजीवी कीटों को पराग मिल जाता है तथा उनके संरक्षण में मदद मिलती है। जैसे गेन्दा, गेलार्डिया, गुलदाऊदी।
कृषि एवं पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से महŸवपूर्ण वानस्पतिक कीटनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। अधिकतर पादप आधारित कीटनाशकों को किसान स्वयं ही तैयार कर सकते है। नीम, लहसुन, गेन्दा, तुलसी आदि के विभिन्न भागों से बने उत्पाद प्रयोग में लाए जाते है। इनमें नीम आधारित कीटनाशी जैसे निम्बौली का सत, नीम का तेल सर्वाधिक प्रचलित है।

गेहूँ की फसल में लगने वाले कीट एवं उनके नियन्त्रण

कीट का नाम नियन्त्रण
1. एफिड- गौमूत्र (1.5 ली.)  तम्बाकू (1.5 ग्राम)/टंकी (15 ली.)
2. रूट   एफिड -वर्टीसीलियम (75 ग्राम)/टंकी (15 ली.) या मेटाराईजम + बेबेरिया 100 मि.ली./15 ली.

गेहूँ की फसल में लगने वाले रोग एवं उनका नियन्त्रण

रोग का नाम – नियन्त्रण
1Yellow Rust  (पीला रतुआ) स्यूडोमोनास (75 ग्राम) $ हल्दी (60 ग्राम)/टंकी (15 ली.)
चूना (75 ग्राम) $ नीला थोथा (75 ग्राम)/टंकी (15 ली.)
2. Karnal Bunt  (करनाल बंट) लाल दवा (15 ग्राम)/टंकी (15 ली.)
3.Wheat Smut  (कण्डवा रोग) अनावृत कण्डवा रोग की रोकथाम हेतु गर्म पानी (52 डिग्री
सेंटीग्रेट) द्वारा बीजोपचार करें। इस प्रक्रिया में प्रथम बीजों को
ठण्डें पानी में भिगोएं तत्पश्चात् बीजों को गरम पानी (52 डिग्री
सेंटीग्रेट) में 10 मिनट तक भिगोएं तथा छायादार जगह पर सूखा दें। अनावृत कण्डवा रोग से बचाव हेतु बीज को सौर उपचार करके बोयें।

फसल कटाई: उपयुक्त समय पर कटाई करें भण्डारण से पूर्व बीजों में नमी की मात्रा 10-15 प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहियें।
उपरोक्त विधि से फसल उत्पादन करने पर 50-60 क्विंटल  प्रति हैक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।
नोट:- तकनीकी प्रशिक्षण के लिए हर माह की 15 तारीख को प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होता है उसमें आप पंजीकरण करा सकते है – पंजीकरण के लिए नं. 8875995439

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